बुधवार, 4 नवंबर 2009

याद आता है वो गाना " मार गयी मुझे तेरी जुदाई "


किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में गाया गया वो गाना " मार गयी मुझे तेरी जुदाई " गाने के वो स्वर याद आते है पर आज का किशोर कुमार और आशा भोसले यह गाना नहीं गायेगे अब यह दोनों गायक गायेगे कि " मार गयी मुझे ये महगाई " अब हर कोई वोलेगा और कहता रहेगा कि केंद्र सरकार को अपना काम बंद करके बस रूपया के ध्यान में लग जाना चाहिए कि किसके हाथ कितना लगा और कौन खाली रह गया बस रूपया ही बटोरने में लगे है खद्दर धारी धोती कुरता पहन कर बन बन गए नेताजी और बैठ कर चलाने लगे १०० करोड़ से ज्यादा आबादी बाले देश को और करने लग जाते है भारत की जनता के भविष्य का फैसला और कर दिया देश को परदेशियों के हवाले मुझको याद आ रहे है वो दिन जब गाँधी जी ने स्वदेशी आन्दोलन जो बंगाल में १९०५ में चलाया था जिसमे उन्होंने विदेशी सामान का उपयोग करने से मना किया था और स्वदेशी सामान को अपनाने के लिए आवाज उठाई थी | तब पूरा देश एक आवाज में उनके साथ चल दिया था तो आज भी हिन्दुस्तानी होने के नाते भारत की जनता एक स्वर में नेताजी के साथ चल देती है , पर वह यह नहीं जानती कि वह जिनको अपना मान रही है जब वो अपनों के ही न हुए तो फिर देश के क्या हो सकते है | वो देश को आगे नहीं और पीछे ले जा रहे है | वह आने वाले भारत के भविष्य को कर्ज की उन जंजीरों में लपेट रहे जिनको तोड़ने में हमारे देश के कितने युवा शहीद हुए और उनकी शहादत के बदले हमको आजादी देकर जाने वाले वो अंग्रेज जाते समय इस देश को दो भागो में कर गए , जो आज तक हर छोटी - छोटी बातो पर लड्ते है और देश के बारे में न सोच कर अपनी नाक ऊपर करने में लगे है तो क्या लगता है , यह देश कितना ऊपर जायेगा ? जिस देश में रूपया ही सवसे बड़ा हो वह देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता | जब तक जनता नहीं जागेगी तब तक हम बस महगाई , अत्याचार , बेरोजगारी और बेबसी का रोना रोते रहेगे और कहते रहेगे " मार गयी मुझे ये महगाई "

आम आदमी की जेब पर डाका |


आज देल्ही सरकार ने परिवहन किराये में बढोतरी क्या की तो आम आदमी की जेब पर चोरी करने का मौका मिल गया हो सभी ब्लू लाइन बस मालिको को और करने लग लगे लुटपाट अपनी मन मानी | क्या कभी सरकार ने सोचा है कि हम जो किराये में बढोतरी कर रहे है उसका आम आदमी के दिल पर कितना बड़ा आघात पहुचेगा और जो आज बेरोजगारी के दोंर में अपनी नयी दुनिया शुरू करने के सपने सजो रहा था बो आज दिल्ही सरकार के इस फैसले से आज वो अपनी दुनिया नहीं रोजी रोटी के लिए भी सोच रहा है कि किस तरह वो अपने आप को मजबूत बना पायेगा और क्या करेगा इस दुनिया में ( या कहे दिल्ही में ) जिधर बस कागज का राज चलता है मतलब आप समझ ही गए होगे कि कागज रूपया को बोलते है जो आज अपना पूरा साम्राज्य इस दुनिया पर जमा चुका है | हर तरफ बस रूपया बोलता है तो क्या आज रूपया ही सब कुछ है कौन समझाए दिल्ही सरकार को कि रूपया से बड़ा भी कुछ होता है ये नोकर शाही समझते क्यूँ नहीं कि बस के किराये में बढोतरी करने से कोई बड़ा काम नहीं कर रहे है बस आदमी की जेव पर डाका डाल रहे है और उसको मजबूर कर रहे है गलत कदम उठाने के लिए और यदि सरकार ने इन सभी मामूली से मुदो पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो दिल्ही ही नहीं पूरा भारत देश इस आग में जल जायेगा और पता नहीं इस घटना की जवाव देही किसकी होगी यह तो सरकार ही बता सकती है ?