किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में गाया गया वो गाना " मार गयी मुझे तेरी जुदाई " गाने के वो स्वर याद आते है पर आज का किशोर कुमार और आशा भोसले यह गाना नहीं गायेगे अब यह दोनों गायक गायेगे कि " मार गयी मुझे ये महगाई " अब हर कोई वोलेगा और कहता रहेगा कि केंद्र सरकार को अपना काम बंद करके बस रूपया के ध्यान में लग जाना चाहिए कि किसके हाथ कितना लगा और कौन खाली रह गया बस रूपया ही बटोरने में लगे है खद्दर धारी धोती कुरता पहन कर बन बन गए नेताजी और बैठ कर चलाने लगे १०० करोड़ से ज्यादा आबादी बाले देश को और करने लग जाते है भारत की जनता के भविष्य का फैसला और कर दिया देश को परदेशियों के हवाले मुझको याद आ रहे है वो दिन जब गाँधी जी ने स्वदेशी आन्दोलन जो बंगाल में १९०५ में चलाया था जिसमे उन्होंने विदेशी सामान का उपयोग करने से मना किया था और स्वदेशी सामान को अपनाने के लिए आवाज उठाई थी | तब पूरा देश एक आवाज में उनके साथ चल दिया था तो आज भी हिन्दुस्तानी होने के नाते भारत की जनता एक स्वर में नेताजी के साथ चल देती है , पर वह यह नहीं जानती कि वह जिनको अपना मान रही है जब वो अपनों के ही न हुए तो फिर देश के क्या हो सकते है | वो देश को आगे नहीं और पीछे ले जा रहे है | वह आने वाले भारत के भविष्य को कर्ज की उन जंजीरों में लपेट रहे जिनको तोड़ने में हमारे देश के कितने युवा शहीद हुए और उनकी शहादत के बदले हमको आजादी देकर जाने वाले वो अंग्रेज जाते समय इस देश को दो भागो में कर गए , जो आज तक हर छोटी - छोटी बातो पर लड्ते है और देश के बारे में न सोच कर अपनी नाक ऊपर करने में लगे है तो क्या लगता है , यह देश कितना ऊपर जायेगा ? जिस देश में रूपया ही सवसे बड़ा हो वह देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता | जब तक जनता नहीं जागेगी तब तक हम बस महगाई , अत्याचार , बेरोजगारी और बेबसी का रोना रोते रहेगे और कहते रहेगे " मार गयी मुझे ये महगाई "
"क्या होगा मेरा नाम ?" विशेष रूप से महिलाओं पर आधारित है | नारी के अनेकों रूप होते हैं, अतः मेरा प्रयास यही है की मैं नारी के हर रूप को समाज के सामने ला सकूँ |
बुधवार, 4 नवंबर 2009
याद आता है वो गाना " मार गयी मुझे तेरी जुदाई "
किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में गाया गया वो गाना " मार गयी मुझे तेरी जुदाई " गाने के वो स्वर याद आते है पर आज का किशोर कुमार और आशा भोसले यह गाना नहीं गायेगे अब यह दोनों गायक गायेगे कि " मार गयी मुझे ये महगाई " अब हर कोई वोलेगा और कहता रहेगा कि केंद्र सरकार को अपना काम बंद करके बस रूपया के ध्यान में लग जाना चाहिए कि किसके हाथ कितना लगा और कौन खाली रह गया बस रूपया ही बटोरने में लगे है खद्दर धारी धोती कुरता पहन कर बन बन गए नेताजी और बैठ कर चलाने लगे १०० करोड़ से ज्यादा आबादी बाले देश को और करने लग जाते है भारत की जनता के भविष्य का फैसला और कर दिया देश को परदेशियों के हवाले मुझको याद आ रहे है वो दिन जब गाँधी जी ने स्वदेशी आन्दोलन जो बंगाल में १९०५ में चलाया था जिसमे उन्होंने विदेशी सामान का उपयोग करने से मना किया था और स्वदेशी सामान को अपनाने के लिए आवाज उठाई थी | तब पूरा देश एक आवाज में उनके साथ चल दिया था तो आज भी हिन्दुस्तानी होने के नाते भारत की जनता एक स्वर में नेताजी के साथ चल देती है , पर वह यह नहीं जानती कि वह जिनको अपना मान रही है जब वो अपनों के ही न हुए तो फिर देश के क्या हो सकते है | वो देश को आगे नहीं और पीछे ले जा रहे है | वह आने वाले भारत के भविष्य को कर्ज की उन जंजीरों में लपेट रहे जिनको तोड़ने में हमारे देश के कितने युवा शहीद हुए और उनकी शहादत के बदले हमको आजादी देकर जाने वाले वो अंग्रेज जाते समय इस देश को दो भागो में कर गए , जो आज तक हर छोटी - छोटी बातो पर लड्ते है और देश के बारे में न सोच कर अपनी नाक ऊपर करने में लगे है तो क्या लगता है , यह देश कितना ऊपर जायेगा ? जिस देश में रूपया ही सवसे बड़ा हो वह देश कभी भी तरक्की नहीं कर सकता | जब तक जनता नहीं जागेगी तब तक हम बस महगाई , अत्याचार , बेरोजगारी और बेबसी का रोना रोते रहेगे और कहते रहेगे " मार गयी मुझे ये महगाई "
आम आदमी की जेब पर डाका |
आज देल्ही सरकार ने परिवहन किराये में बढोतरी क्या की तो आम आदमी की जेब पर चोरी करने का मौका मिल गया हो सभी ब्लू लाइन बस मालिको को और करने लग लगे लुटपाट अपनी मन मानी | क्या कभी सरकार ने सोचा है कि हम जो किराये में बढोतरी कर रहे है उसका आम आदमी के दिल पर कितना बड़ा आघात पहुचेगा और जो आज बेरोजगारी के दोंर में अपनी नयी दुनिया शुरू करने के सपने सजो रहा था बो आज दिल्ही सरकार के इस फैसले से आज वो अपनी दुनिया नहीं रोजी रोटी के लिए भी सोच रहा है कि किस तरह वो अपने आप को मजबूत बना पायेगा और क्या करेगा इस दुनिया में ( या कहे दिल्ही में ) जिधर बस कागज का राज चलता है मतलब आप समझ ही गए होगे कि कागज रूपया को बोलते है जो आज अपना पूरा साम्राज्य इस दुनिया पर जमा चुका है | हर तरफ बस रूपया बोलता है तो क्या आज रूपया ही सब कुछ है कौन समझाए दिल्ही सरकार को कि रूपया से बड़ा भी कुछ होता है ये नोकर शाही समझते क्यूँ नहीं कि बस के किराये में बढोतरी करने से कोई बड़ा काम नहीं कर रहे है बस आदमी की जेव पर डाका डाल रहे है और उसको मजबूर कर रहे है गलत कदम उठाने के लिए और यदि सरकार ने इन सभी मामूली से मुदो पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया तो दिल्ही ही नहीं पूरा भारत देश इस आग में जल जायेगा और पता नहीं इस घटना की जवाव देही किसकी होगी यह तो सरकार ही बता सकती है ?
शनिवार, 3 अक्टूबर 2009
नयी बहु के स्वागत में लगा एक परिवार ?????????

किसी घर में एक नयी बहु के आने कि जो उमंग होती है, जो उत्साह होता है वही उत्साह और उमंग आज इस घर में भी है जिसकी सच्ची कहानी मैं आपको आज बताने जा रहा हूँ |
ये कहानी एक ऐसे परिवार से शुरू होती है जहाँ हमेशा हंसी के ठहाके, भाई बहनों का प्यार और आने जाने वाले लोगों की कतार लगी रहती थी | इस घर व इस घर में रहने वालों को सभी प्यार करते थे | हमेशा की तरह ये परिवार आज भी बहुत खुश था क्यूंकि आज इस परिवार के बड़े लड़के की शादी तय हो गयी थी | पूरा परिवार ख़ुशी में झूम रहा था | माता- पिता को अपनी बहु पाने की ख़ुशी थी तो वहीँ बाकि दो भाई व एकलौती बहन को भाभी पाने की ख़ुशी थी | पूरा परिवार शादी की तैयारी में लग गया | जैसे- जैसे शादी के दिन करीब आ रहा था सबके सपने मानो परवान चढ़ रहे थे | हर कोई अपनी एक अलग ही दुनिया में जी रहा था | ये शादी उनके अपने गाँव से हो रही थी | शादी से एक महीने पहले ही पूरा परिवार गाँव चला गया था शादी की तैयारी के लिए | जहाँ ये सभी इतने खुश थे वहीँ उनका बाकी परिवार जैसे दादा- दादी, चाचा व और लोग बिलकुल विरोध में थे इस शादी के | क्यूंकि अभी लड़के के छोटे चाचा की शादी नहीं हुई थी | परिवार के बाकी लोगों का ये मानना था कि अगर ये शादी पहले हो जायेगी तो उनके चाचा की शादी में रुकावट आएगी | पर कारण कुछ भी हो सच तो ये था की कोई नहीं चाहता था की इस परिवार के लोग खुश रहे | ऐसा आज से नहीं था कई सालों से ये चल रहा था | क्यूंकि लड़के के पिता अपने बच्चों को पढाना चाहते थे इसलिए वो गाँव से शहर में आ गए जो सबको पसंद नहीं था | पर जो भी था लड़के के पापा का कहना था कि भगवन सब देख रहा है | अब देखना ये है कि आगे क्या होता है ? आगे कि कहानी जानने के लिए पढ़ते रहिये क्या होगा मेरा नाम....................
शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009
आज हर महिला के हो गए है अनेको रूप

कहते है की एक महिला किसी का घर बना सकती है तो वही महिला हसते हुई घर को जला भी सकती है एक महिला की अनेको रूप होते है इसको हम माँ , बहन ,पत्नी और बेटी की इलावा अनेको रूपों में हमारे साथ रहती है पर क्या पता कौन सा रूप हमारी साथ क्या कर जाए ? एक मनुष्य की सबसे बड़ी बिडमन्ना होती है उस रूप को समझ पाना
आज मै आपके सामने एक इस तरह की सच्ची घटना को लाना चाहता हूँ कौन सा होगा बह रूप ???????????????????
शुक्रवार, 25 सितंबर 2009
अब मिल रही है मुझे मेरी पहचान |

मैं करती रही इंतजार पर न आया कोई जवाब लेकिन मिल रहा है मुझको अपना नया नाम और असली पहचान.अब रों मेरी जिन्दगी से चला गया है और हर तरफ मंडरा रहे दुःख क वो काले बादल जा रहे हैं और ख़ुशी से भरा हुआ सावन का मौसम अपनी बाहें फैलाये गो़द में लेने के लिए तैयार खडा मेरा इंतजार कर रहा है.पर कभी-कभी मैं अपने पुराने दिनों को सोचती हूँ तो लगता है कि मैंने इन ख़ुशी के दिनों को पाने के लिए कितने मौसम रोते हुए गुजार दिए.उन मौसम में मेरे अपने वो अपने पराये भी मेरे नहीं रहे जिनको मैं अपना कहती थी. वो भी मेरा साथ छोड़ कर चले गए थे.पर आज मैं फिर अपनों के साथ हूँ और जिन परायों की वजह से मैं अपनों का इंतजार कर रही थी मैं आज उन परायों का साथ छोड़ चुकी हूँ. आज मेरी समझ मैं भी आ गया की अपने और परायों में क्या अंतर है. मैं आज से अपनी नयी जिन्दगी की शुरुआत कर रही हूँ. इस नयी जिन्दगी को शुरू करने में मेरे भाई ने मेरा साथ दिया जो की अब मेरा अपना है.और मेरा भाई आज मेरा ध्यान रख रहा है कि कहीं वो पतझड़ का मौसम फिर से मेरे जीवन में न आ जाये और जो नयी जिन्दगी मिली है उसे ख़त्म न कर दे.मैं अपनी जिन्दगी की शुरुआत के समय में आप सभी का साथ और आशीर्वाद चाहती हूँ कि मेरा जीवन हमेशा खुशियों से भरा हो। .......................
यह है मेरी अपनी कहानी मेरी जबानी प्रीती ओझा| अब मैं कर रही हूँ आपके जवाब का इन्तजार , क्या आप हैं मेरे साथ ?
शुक्रवार, 17 जुलाई 2009
इंतजार
मैं आज एक सच ज़माने के सामने लाना चाहता हूँ |

मैं आज एक सच ज़माने के सामने लाना चाहता हूँ | जब मैं दिल्ली में था और जॉब कर रहा था तो जॉब के समय मेरी मुलाकात एक लड्की से हुई जो हमेशा हंसती रहती थी चुलबुली सी थी और अपने स्वाभाव से सब का दिल जीत लेती थी | कम बोलती थी पर जो भी वोलती थी वो पत्थर की लकीर होती थी | सबको अपना बना लेना उसके लिए बहुत आसान था| पर उसको क्या पता था की उसकी ये आदत उसको बहुत रुलाएगी | अब मुझे भी उसका हँसता हुआ चेहरा देखने की आदत सी पड़ गई थी | धीरे- धीरे मैं उसके बहुत करीब आ गया | अब हम अक दूसरे से बहुत सी बातें करने लगे | कुछ दिनों बाद उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा मुरझाने लगा | वो अपनी हँसी ही भूल गई और जब वह मुस्कुराती तो ऐसा लगता था जैसे की कोई नाटक कर रही है जबकि पहले ऐसा नहीं था | पहले जब वो मुस्कुराती थी तव फूल बरसते थे पर आज ऐसा क्या हुआ कि वो मुस्कुराना भूल ही गयी | उसकी इस हालत ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया | कोइ तो वजह होगी क्या है वो वजह ?
शायद उसकी इस हालत कि वजह उसका हर किसी को अपना मानना और इज्जत देना था | उसके इसी स्वाभाव ने आज उसे रोने के लिए छोड़ दिया | धीरे- धीरे वो गुमनामी की दुनिया में खोती जा रही थी | आज वो अपनी पहचान खो चुकी थी | उसकी ये हालत मुझसे सहन नही हो रही थी | मैं पूछता हूँ कि क्या किसी को अपना बोलना गलत है यदि हां तो प्यार करना और उसमे आस्था रखने जैसी सभी बातें बेमानी हो जाती है |
शायद उसकी इस हालत कि वजह उसका हर किसी को अपना मानना और इज्जत देना था | उसके इसी स्वाभाव ने आज उसे रोने के लिए छोड़ दिया | धीरे- धीरे वो गुमनामी की दुनिया में खोती जा रही थी | आज वो अपनी पहचान खो चुकी थी | उसकी ये हालत मुझसे सहन नही हो रही थी | मैं पूछता हूँ कि क्या किसी को अपना बोलना गलत है यदि हां तो प्यार करना और उसमे आस्था रखने जैसी सभी बातें बेमानी हो जाती है |
फिर मैंने भी फ़ैसला किया की चाहे कुछ भी हो जाए मैं उसे इस हालत से बहार निकालूँगा | पर मुझे क्या पता था की मेरी ये सोच उसकी जिन्दगी में और ए़क नया तूफ़ान ला देगी अगर पता होता तो शायद मैं ये कदम कभी न उठाता मैं पीछे हट जाता | पर अब मैं उसे इस हालत में छोड़ भी नही सकता था | आज में उसकी पास जाने से भी डरता हूँ कही मेरी वजह से कोई और परेशानी न आ जाए और मैं कमजोर न हो जाऊं और उसको शांत करने की वजाए मैं भी रोना शुरू कर दूँ | आज मैं चाह कर भी उसके लिए कुछ नही कर पा रहा था क्यूँकि हमेशा वो मुझे यही कह कर रोक देती थी वो नही चाहती कि उसकी वजह से किसी को कोई परेशानी हो | मैं समझ नही पा रहा था कि किसी कि खुसी के लिए कोई लड़की इतनी तकलीफ कैसे उठा सकती है | आख़िर इतना त्याग क्यूँ ? इस त्याग और इज्जत के बदले उसे क्या मिला ? आंसू , बेइजत्ती ,गुमनामी | मैं पूछता हूँ कि आख़िर हमेशा लड्की को ही क्यूँ रोना पड़ता है ? जिसमे भूल जाती है बह अपना नाम और पूछती है जमाने से कि
क्या होगा मेरा नाम ?
बुधवार, 15 जुलाई 2009
रविवार, 17 मई 2009
क्या होगा मेरा नाम ?

क्या होगा मेरा नाम ?
महिलाओ पर हो रहे अत्याचारों को देखते हुए शुरू किया गया है । मैं जब भी किसी शहर में घुमने गया तब हर जगह महिलाओ पर अत्याचार होता दिखा उस समय मै यही सोचता हूँ कि औरत की पहचान क्या है ? कभी तो कोई उसको माँ , बहन , बेटी , दादी , बहु का नाम दिया जाता है । पर क्या हम सभी हकीकत में इन नामो से उन्हें पुकारते है। नही, हम हर बक्त उनको डराते ,धमकाते और अत्याचार करते रहना ही हमारा काम है क्या कभी होगा उसका कोई नाम तो बताओ
क्या होगा मेरा नाम ?
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