
मैं आज एक सच ज़माने के सामने लाना चाहता हूँ | जब मैं दिल्ली में था और जॉब कर रहा था तो जॉब के समय मेरी मुलाकात एक लड्की से हुई जो हमेशा हंसती रहती थी चुलबुली सी थी और अपने स्वाभाव से सब का दिल जीत लेती थी | कम बोलती थी पर जो भी वोलती थी वो पत्थर की लकीर होती थी | सबको अपना बना लेना उसके लिए बहुत आसान था| पर उसको क्या पता था की उसकी ये आदत उसको बहुत रुलाएगी | अब मुझे भी उसका हँसता हुआ चेहरा देखने की आदत सी पड़ गई थी | धीरे- धीरे मैं उसके बहुत करीब आ गया | अब हम अक दूसरे से बहुत सी बातें करने लगे | कुछ दिनों बाद उसका खिलखिलाता हुआ चेहरा मुरझाने लगा | वो अपनी हँसी ही भूल गई और जब वह मुस्कुराती तो ऐसा लगता था जैसे की कोई नाटक कर रही है जबकि पहले ऐसा नहीं था | पहले जब वो मुस्कुराती थी तव फूल बरसते थे पर आज ऐसा क्या हुआ कि वो मुस्कुराना भूल ही गयी | उसकी इस हालत ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया | कोइ तो वजह होगी क्या है वो वजह ?
शायद उसकी इस हालत कि वजह उसका हर किसी को अपना मानना और इज्जत देना था | उसके इसी स्वाभाव ने आज उसे रोने के लिए छोड़ दिया | धीरे- धीरे वो गुमनामी की दुनिया में खोती जा रही थी | आज वो अपनी पहचान खो चुकी थी | उसकी ये हालत मुझसे सहन नही हो रही थी | मैं पूछता हूँ कि क्या किसी को अपना बोलना गलत है यदि हां तो प्यार करना और उसमे आस्था रखने जैसी सभी बातें बेमानी हो जाती है |
शायद उसकी इस हालत कि वजह उसका हर किसी को अपना मानना और इज्जत देना था | उसके इसी स्वाभाव ने आज उसे रोने के लिए छोड़ दिया | धीरे- धीरे वो गुमनामी की दुनिया में खोती जा रही थी | आज वो अपनी पहचान खो चुकी थी | उसकी ये हालत मुझसे सहन नही हो रही थी | मैं पूछता हूँ कि क्या किसी को अपना बोलना गलत है यदि हां तो प्यार करना और उसमे आस्था रखने जैसी सभी बातें बेमानी हो जाती है |
फिर मैंने भी फ़ैसला किया की चाहे कुछ भी हो जाए मैं उसे इस हालत से बहार निकालूँगा | पर मुझे क्या पता था की मेरी ये सोच उसकी जिन्दगी में और ए़क नया तूफ़ान ला देगी अगर पता होता तो शायद मैं ये कदम कभी न उठाता मैं पीछे हट जाता | पर अब मैं उसे इस हालत में छोड़ भी नही सकता था | आज में उसकी पास जाने से भी डरता हूँ कही मेरी वजह से कोई और परेशानी न आ जाए और मैं कमजोर न हो जाऊं और उसको शांत करने की वजाए मैं भी रोना शुरू कर दूँ | आज मैं चाह कर भी उसके लिए कुछ नही कर पा रहा था क्यूँकि हमेशा वो मुझे यही कह कर रोक देती थी वो नही चाहती कि उसकी वजह से किसी को कोई परेशानी हो | मैं समझ नही पा रहा था कि किसी कि खुसी के लिए कोई लड़की इतनी तकलीफ कैसे उठा सकती है | आख़िर इतना त्याग क्यूँ ? इस त्याग और इज्जत के बदले उसे क्या मिला ? आंसू , बेइजत्ती ,गुमनामी | मैं पूछता हूँ कि आख़िर हमेशा लड्की को ही क्यूँ रोना पड़ता है ? जिसमे भूल जाती है बह अपना नाम और पूछती है जमाने से कि
क्या होगा मेरा नाम ?